दो साल पहले जब वृन्दावन गया तो रात को ये पदयात्रा देखने भी गया l उसके बाद भीड़ जो हमेशा भेड़ से ज्यादा कुछ नहीं होती, उसका व्यवहार देखा l सब सड़कों पर महाराज जी और उनके परिकरों की चरण रज, sorry चरण रज नहीं कहकर shoes रज और उससे कुचले फूलों की पंखुडियों को लेने के लिये दौड़ पड़े l
@पाठशाला गुरुजी ( Pathshala GuruG )
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