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अब आप खुद देखकर बताइए कि इस रीति-रिवाज़ से गैरों के रीति-रिवाज़ की बू आ रही है या नहीं? अगर हम बोलेंगे तो फिर बोलेंगे कि इसे न मानने की दलील कहाँ है? तुम लोग तो गुस्ताख़-ए-औलिया हो! हम तो एक्स्ट्रा इबादत कर रहे हैं जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस का मफ़हूम है कि दीन · XDL