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धर्म से ज़्यादा मुक्तिप्रद कुछ नहीं और धर्म से बड़ा बंधन भी कुछ नहीं समझे बिना बस कर्मकांड निभाना, क्या यही धर्म है? धर्म न तो जानने की, न समझने की इच्छा बची है, लोग बस दायित्व निभाते चले जा रहे हैं। बिना समझे पूजा पाठ करने का ही नतीजा है कि अब एक पीढ़ी कहती है, “इन चीज़ों का · XDL