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ख़ैर… अब जाओ तुम, अब नहीं खोजूँगी तुम्हें। बहुत ढूँढ लिया तुम्हें अपनी रातों में, अपनी दुआओं में, अपनी हर अधूरी कविता में। अब बस मोहब्बत में ख़ुद को लिखूँगी। तुम्हारे आने की उम्मीद में जो ख़ुद को कहीं पीछे छोड़ आई थी, अब उसी ख़ुद को फिर से आवाज़ दूँगी। "आम" से "खास" बनूँगी। · XDL